Saturday, 19 March 2016

लालकिले का प्रसिद्ध राष्ट्रीय कविसम्मेलन

उस दिन गणतन्त्र समारोहों के सिलसिले मे आयोजित होने वाला लालकिले का प्रसिद्ध राष्ट्रीय कविसम्मेलन शुरू हुआ तो रात के नौ बज रहे थे। उदघाटन के लिए मुख्यमंत्री आने वाले थे। मैत्रेयी जी से मुझे वहाँ पहुँचने का आदेश पहले ही मिल चुका था। अरविंद आए तो उनके साथ करीब करीब पूरी सरकार ही थी। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया भी थे। खाद्य और रसद मंत्री इमरान हुसैन और कला व संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा भी थे। विशिष्ट अतिथि थे कुमार विश्वास और मंच पर उपस्थित अबालवृद्ध 44 कवियों की सदारत कर रहे थे वसीम बरेलवी साहब। ....और मंच-संचालन वयोवृद्ध कवि श्री शिवओम अंबर के हाथों मे। दो दो पंक्तियों मे सबने अपनी बात रखी। एक कुमार विश्वास और दूसरे अरविंद केजरीवाल जब जब सामने आए, तब तब उपस्थित कविताप्रेमियों ने हर्षध्वनि से उनका स्वागत किया। कुमार विश्वास ने कहा कि इस कविसम्मेलन के लिए भेजे जाने वाले आमंत्रण कार्ड पर पहले एक शर्त लिखकर भेजी जाती थी कि कार्यक्रम मे भाग लेने वाले कवि कोई राजनीतिक टिप्पणी नही करेंगे, किसी राजनीतिक व्यक्ति को नही कोसेंगे। हमने यह परंपरा बदली है और हिन्दी अकादमी ने शर्तों वाला यह विंदु कार्ड से हटा दिया है। आप सभी का आवाहन है कि यहाँ सामने बैठाकर मुख्यमंत्री की आँखों मे आँखें डालकर मफ़लरमैन की आलोचना कीजिये। सब सुना जाएगा। इस वक्तव्य पर मुख्यमंत्री ने हामी भरी तो पूरा पंडाल तालियों से गड़गड़ा उठा। फिर शुरू हुआ कविताई का दौर। यह भी पहली ही बार देखने मे आया कि हिन्दी कविता के किसी मंच पर उर्दू का एक बड़ा शायर सदारत करने बुलाया गया था।
लगभग ग्यारह बजे जब मुख्यमंत्री लगभग एक दर्जन कवियों की रचनाएँ सुनकर चलने को हुए कि तभी....पंडाल के एक कोने मे समझा बुझाकर, योजनाबद्ध ढंग से बैठाये गए कुछ नामालूम छोकरों ने धड़कते दिलों और कांपती आवाजों मे कौवा बोली बोलना शुरू कर दिया----मोउदी...मोउदी...मोउदी...मोउदी....! मेरा सीना चौड़ा हो गया देखकर कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस कौवाबोली की तरफ नज़र उठाकर भी नही देखा, लेकिन पंडाल मे एक सन्नाटा तो खिंच ही गया। मुख्यमंत्री चाहते तो इस नाममाला का प्रसाद तुरंत भेंट कर सकते थे लेकिन जब वे पूरी शालीनता से एकदम चुपचाप पंडाल से निकल गए तो कवि मंच से एक कवि बोल पड़े-- अच्छा है...अच्छा है...बहुत अच्छा है...कि दो सौ रूपये किलो वाली दाल खाकर भी अभी मंत्र नही भूला। हम भूल गए रे सब बात, तुम्हारा प्यार नही भूला। smile emoticon दोस्तों, रातभर चला यह कविसम्मेलन। रात नौ बजे से सुबह आठ बजे तक। वसीम बरेलवी को सुनने के लिए हमी नही, दिल्ली सरकार के तीन मंत्री और चार बड़े नेता पूरी रात सामने दर्शकों मे बैठे रहे, सबके साथ हँसते रहे, कवितायें सुनते रहे और आलोचनाएँ गुनते रहे। खास बात ये कि सरकार की आलोचना सरकार के मुंह पर की गयी और सरकार हंस हंस के तालियाँ बजाती रही। अपनी कमियाँ कागजों पर नोट करती रही और शाम को जो सूरज डूबा था, वो वसीम बरेलवी की दो नज़्मों के साथ सुबह पूरे प्रकाश से चमका। इस सरकार की पूरे समय की उयपस्थिति और यूं सुलभ उपलब्धता पर कविमंच कुर्बान रहा। छोटी छोटी लड़कियों ने बड़ी बड़ी कवितायें पढ़ीं, छोटे छोटे लड़कों ने अपनी परिपक्व शायरी से मन रूमानी कर दिया। वसीम बरेलवी को सामने सुनने का यह मौका मेरे लिए बीसवीं पचीसवीं बार मिला था। अगर ऐसे किसी कविसम्मेलन या मुशायरे मे सिर्फ श्रोता बनने का मौका मिले तो यकीन मानिए समकालीन राजनीति और सामाजिक परिवेश के बंद कितने ही कपाट आपके सामने झनझनाकर टूटते बिखरते मिलेंगे। लगेगा कि जैसे अभी अभी तो जिंदगी का सवेरा हो रहा है...सूरज खिल रहा है...कलियाँ मुस्कुरा रही हैं....पंछी चहक रहे हैं....और हवा बसंती हो उठी है।
याद आते हैं अपने गुड्डे गुड़ियों वाले दिन।
दस पैसे मे दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन॥

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