Saturday, 19 March 2016

शहादत की पॉलिटिक्स

शहीद लांस नायक हनुमानथप्पा कोप्पड की शहादत को मेरा भी सलाम...!
हनुमानथप्पा के बाकी साथी जवान सूबेदार नागेश, हवलदार इलुमलाई, लांस हवलदार एस कुमार, लांस नायक सुधीश, सिपाही महेश, सिपाही गणेशन, सिपाही राममूर्ति, सिपाही नर्सिंग सहायक सूर्यवंशी और सिपाही मुश्ताक अहमद....ये वे लोग थे जो सियाचिन मे पेंगुइन पकड़ने गए थे लेकिन पकड़ एक्को नही पाये। सियाचिन ग्लेशियर पर ये लोग कबड्डी खेलते खेलते मर गए। उतने ही माइनस तापमान और उतने ही जटिल हालात मे उतनी ही बर्फ के नीचे दबकर वैसे ही सांसें घुटकर मर तो ये भी गए लेकिन अंतर ये रहा कि राष्ट्रवादी हवा मे ये उतना नशा नही भर पाये, जितना नशा जाने अनजाने हनुमानथप्पा भर गए। बाकी नौ तो एक ही बार मे शहीद हो गए इसलिए वे उतने बहादुर नही थे। हनुमानथप्पा को दो बार शहीद किया गया, इसलिए वे अपने साथियों की तुलना मे अधिक बहादुर थे। अब जिसकी शहादत सियासत को ही रास न आए, उसकी शहादत भी कोई शहादत है यार...! हिंदुस्तान की सियासत मे 'कोमा' की भी अपनी पॉलिटिक्स होती है पार्टनर...!
घोषित, अघोषित और चर्चित, अचर्चित इन दो फ्लेवरों की शहादत के ताबूत उठाए आइये चलिये जेएनयू चलना पड़ेगा। कुछ और भी फ्लेवर हैं। वहाँ अफजल गुरु की शहादत पर जश्न चल रहा है। फिर हैदराबाद चलना होगा जहां याक़ूब मेमन की शहादत पर उत्सव हुआ था। फिर मेरठ, गोवा और पूना चलेंगे जहां हाल हाल मे नाथू गोडसे की शहादत को हुतात्माई शहादत का दर्जा मिला है। घूम घाम के लौटें फिर चलेंगे टाटा के घर, अंबानी के घर, मोदी के घर, सोनिया के घर, मायावती, मुलायम सिंह, जयललिता और प्रणव मुखर्जी के घर, संजोग से जिनके घरों मे शहीद पैदा ही नही होते। ये वे चौखटें हैं, जहां शहादतों के कैरेक्टर निर्धारित होते हैं, जहां शहादतों के रंग गाढ़े किए जाते हैं, जहां भिन्न भिन्न प्रकार की शहादतों की पैथोलॉजी किए जाने की परंपरा रही है। फाइनली लौटते हुए हम एक हवाई सर्वेक्षण मे शामिल होंगे, जिसके तहत आसमानी खिड़कियों से हम उन गांवों और ग्रामीणों का दीदार कर लेंगे जो बदकिस्मत होते हैं और शहादतों का मजा लेना ही नही जानते, खाली शहीदों की फौज पैदा करते हैं....और जिनके बच्चे शहीद होने सियाचिन जाते हैं।
शहादत और बहादुरी दो सियासी शब्द हैं। आखिर सियासत भी तो कोई चीज़ है। न होती तो बुद्ध, गांधी और विवेकानंद की भूमि पर हेडली कोलमैन के 'वीडियो कांफ्रेंस्ड सच' ऐसा मनभावन भूडोल कैसे ला पाते कि हमारे सैनिकों की शहादत पर वो अब्दुल बासित भी दुखी हो उठा हो....!

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