गाय माँ है,बिल्ली मौसी है, और बंदर/चंदा/भालू मामा है। वनों और प्रकृति से हमारा जो गहरा नाता है,वो माँ की तरफ का है, बाप की तरफ का नही। बाप की तरफ का हो भी नही सकता। बापों ने ही तो तय किए हैं ये सारे नाते,कोई माओं,मौसियों ने तो नही किए॥ माओं को पिताओं की चंगुल मे इतना रहना पड़ा है,इस सीमा तक रहना पड़ा है कि पितृवादी संस्कार माओं मे भी समाहित होते गए। फिर आप याद करिए,अपने बचपन के दिन-माँ-बाप,मौसी,बुआ,चाचा,मामा सभी एक ही बात कह के मनाते थे।-वो देखो बाबू चंदा मामा....वो देख मुन्ना गईया मईया....अरे ये बिल्ली मौसी का कौरा खाले बाबू....याद है न सबको ......!ये कोई नही सिखाता था कि वो देख बाबू बरधा चाचा, वो देख मुन्ना हथिनी/मुसड़ी/बनरी बुआ...अले मेला मुन्ना ये देख कौवा या फिर पीपल पापा...ऐसा नही होता। सबके भीतर पिता की सत्ता बैठी है। माओं के अंदर भी माँ के संस्कार भर बचे है। उनके अंदर भी सत्ता पिताओं की ही है। वे भी बस अपनी ममता की शिकार हैं,वरना पूरा बाप बन जाने मे माओं को भी कोई दिक्कत नही है। कोशिश भी वही चल रही है।सामाजिक बहाव भी उसी दिशा मे है। स्त्रियॉं के भीतर जितनी मात्रा मे माँ बची हुई है,दरअसल वही पूरे सामाजिक स्ट्रक्चर को बांध के रक्खे हुए है।यह मनोविज्ञान बहुत गहन और विहंगम एकसाथ दोनों है।इस मानसिक सत्ता को विस्थापित होना चाहिए...सोच के देखिये माँ,मौसी और मामा के अलावा भी अपनी प्रकृति से इस लगभग मर्द हो चले समाज का कोई नाता हो सकता है क्या...?? यदि हो सकेगा तो आस्था का संतुलन बाप की ओर भी झुकेगा...!
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