हम बनारस वालों ने विकास का पहला चरण सफलतापूर्वक पार कर लिया है और बनारस पहली स्मार्ट सूची से बुरी तरह धकियाकर बाहर निकाल दिया गया है। लगभग बीस महीनों की अनवरत चीख चिंघाड़ के बाद अब जो बनारस बच गया है, उसकी एक तस्वीर उतारने की कोशिश कर रहा हूँ। जनवरी की शुरुआत से ही गंगा अपने घाटों को छोडकर नीचे सरक गयी है। यद्यपि इसके सरकने, खिसकने और रेंगने आदि पर कई क़ानूनों का भी पहरा रहता है लेकिन गंगा किस कानून की गुलाम है भला। डीजल का धुआं उगलते स्टीमरों की बेखौफ आवाजाही से कोई कानून टूट रहा हो या नही, पर गंगा की जान जरूर सांसत मे फंसी हुई है। कल अस्सी घाट से लेकर राजघाट तक घाट घाट गुजरते हुए अपनी यात्रा पूरी की तो वातावरण मे ठंड थी और दिमाग मे ख़यालों की बारिश। मुझे लगा कि प्रयास अगर ईमानदार होते तो आज गंगा मे स्टीमर डीजल से नही, सोलर एनर्जी से चल रहे होते। इधर राजघाट स्थित मालवीय पुल पर पिछले दिनों जो एलईडी लगवाए गये हैं, अब वे अन्य दूसरे घाटों पर भी दूधिया रोशनी मे बरस रहे हैं। रोशनी अच्छी लगती है, लेकिन प्रकृति के इतने समीप इतनी चकाचौंध अच्छी नही लगती। इन्हे भी अगर सोलर एनर्जी से ही बदल सकते तो इससे अच्छा कुछ नही होता। असल मे केवल गंगा ही नही मर रही है, आसपास का पूरा वातावरण भी मर रहा है। वैसे भी गंगा को केवल प्राकृतिक या भौगोलिक घटना मानना भूल होगी, क्योंकि गंगा वास्तव मे इस देश की एक बड़ी सांस्कृतिक घटना है। घाटों पर रात के समय उतरने वाली इस रोशनी की रंगत मे उजाला चाहे जितना हो, बनरसीपन बिलकुल नही है। एलईडी की चकाचौंध रात को दिन बनाकर रख देती है। जबकि किसी भी नदी की प्रकृति इस बनावट के विरुद्ध होती है। हमको आपको हो न हो, लेकिन नदी को दिन के उजाओं और रात के अँधेरों की जरूरत उसके प्राकृतिक स्वरूप मे पड़ती है और बहुत गहन अर्थों मे पड़ती है। आदमी तो फिर भी अपनी अधुनातन सुविधाओं के लिए प्रकृति की व्यवस्थाओं मे हज़ार छेड़छाड़ करता है लेकिन प्रकृति खुद अपनी व्यवस्थाओं मे कोई छेड़छाड़ नही चाहती, करती भी नही है। विकास और सुंदरीकरण के नाम पर आप हर शहर मे गंगा की ये रातें दिन मे बदल डालने की ये जो कवायद कर रहे हैं, क्या आपको एहसास है कि अगर ये पचास शहर भी हों तो आपने नदी की प्राइवेसी पचास बार भंग की...? इसीलिए नदियां गांवों, जंगलों और पहाड़ों मे इठलाती, बल खाती हुई बहती हैं और शहरों मे पहुँचकर रंगने लगती हैं, बेचैनी महसूस करती हैं। इन्हे मिट्टी के बजाय पक्के पक्के घाट मिलने लगते हैं। इन पक्के घाटों पर पहुँचकर नदी को सांस लेने मे दिक्कत होती है। नीद मे बेसुध नदी ज्योंही इस शहर मे दाखिल होती है त्योंही उसकी मुलाक़ात अस्सी घाट और उसकी चकाचौंध से होती है। उसकी नीद मे खलल पड़ता है। अचानक से खुद को रोशनी मे नहाई पाकर नदी सकुचा जाती है। अस्त व्यस्त अपने कपड़े संभालती हुई नदी करवट बदलकर अपना मुंह उस पार रेती की ओर कर लेती है। नदी नीद मे है, वह सोना चाहती है पर अभी तो घाटों की लाइन और एलईडी की झड़ी लगी हुई है। दो दो श्मशानों से गुजरती हुई गंगा बहुत बेचैनी की हालत मे पूरा शहर और उसका विकास पार करती है कि तबतक राजघाट आ जाता है। इसके आगे अंधेरा दिख रहा है। रात अभी शेष है। यहाँ आकार गंगा अपने गालों पर ढुलक आए आंसुओं को अपने फटे हुए आँचल से पोंछती है। अब सैदपुर और गाजीपुर तक इस छिछोरे विकास से कुछ राहत रहेगी --नदी सोचती है।
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