Saturday, 19 March 2016

देशभक्ति बाज़ार नही, हमारा संस्कार है


 
देश की सीमाओं की सुरक्षा का सीधा संबंध देश की सेना से है। उसके लिए रक्षा मंत्रालय है, जहां मंत्रियों से लेकर संतरियों तक की विशाल फौज है। भारत की जनता अपनी टेंट से ये सारा खर्च वहन कर सकती है। पहले भी करती रही है, आगे भी करती रह सकती है। अपनी सरकार से भी इस मद मे उसे कोई मदद नही चाहिए। सैन्य संचालन के बजट मे अंतर्राष्ट्रीय भिखमंगई से सरकार को मिलने वाला पैसा भी लगाने की कोई जरूरत नही है। मेरा मानना है कि देश मे निवेश होने वाली विदेशी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा जो अबतक रक्षा मद मे मर्ज किया जाता रहा है, वह भी अबतक की सभी सरकारों का अविवेक ही रहा है। सरकार को चाहिए कि करों की वसूली मे जनता से प्राप्त धन को ही रक्षा मद मे खर्च करे। बाकी अपनी हवाई विकास योजनाओं मे अपने पुरुषार्थ से प्राप्त 'कर्ज' को वह चाहे जैसे बहाये लेकिन सैन्य मद मे जन धन का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे क्या होगा कि देश की जनता को लगेगा कि यह हमारे खर्च से चलती है इसलिए हमारी सेना है। अभी क्या लगता है कि यह सरकारी खर्च से चलती है इसलिए सरकारी सेना है। कल को यह भी लग सकता है कि यह विदेशी खर्च से चलती है इसलिए विदेशी सेना है। जबकि होना ये चाहिए कि यह हमारे ही खर्च से चले और हम यह महसूस कर सकें कि यह हमारी सेना है।
इस तरह अपनी सेना की देख परख, नीतियाँ, योजनाएँ और इंतजाम सबकुछ सीधे सीधे जन निगरानी मे चलाया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि अब वह जनता के लिए नही,जनता के साथ मिलकर काम करे। सेना कि भुजा भरने का काम जनता का हो, अधुनातन तकनीकी, मशीनों, हथियारों समेत हर खरीद, हर योजना और हर पॉलिसी...इन सभी मोर्चों पर जनता को सीधे भिड़ाया जाना चाहिए और सरकार को खुद को केवल एक सजग पर्यव्यक्षक की भूमिका मे ही रखना चाहिए। देश के प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण दिये जाने कि नीति बनाई जानी चाहिए। देश मे जन्मे सभी के लिए आवश्यक किया जाना चाहिए कि विद्यार्थी जीवन मे ही तीन या पाँच साल का समानान्तर सैन्य प्रशिक्षण हर युवा प्राप्त कर ले, वो चाहे औरत हो या मर्द हो। इस तरह जब देश का हर आदमी सिपाही बनेगा, तो उसके जीवन मे अनुशासन होगा, अपने लक्ष्य के लिए धुन होगी, हर जुनून के प्रति एक पागलपन होगा। जब हर आदमी देश के लिए ड्यूटी के भाव मे खड़ा होगा, जब हर आदमी देश के लिए चार पाँच साल का कठोर सैन्य प्रशिक्षण हासिल करेगा, जब हर आदमी समय से सोने खाने और जागने का महत्व जान जाएगा, जब हर आदमी थके हुए पैरों से भी दौड़ते रहने का हुनर सीख जाएगा, उबलते हुए रेगिस्तान और ठिठुरते हुए पहाड़ जब हर आदमी को समझ मे आ जाएँगे, तब देशभक्ति भी अपने असली अर्थों मे सभी को समझ मे आ जाएगी।
बारूद उगलती पहाड़ियों के बीच पैराशूट लेकर जब हर नागरिक उतरना सीखेगा तो उसके सामने देश और देशभक्ति के वास्तविक अर्थ खुलेंगे। चिंघाड़ते हुए समुद्र की लहरों को चीरती हुई सैनिक टुकड़ियाँ जैसे खुले स्टीमरों मे युद्धक पोतों के बीच से गुजरती हैं, वैसे हर भारतीय जब खतरों का खिलाड़ी बनेगा, तब उसे देशभक्ति के इस राजनीतिक बाज़ार से घिन आने लगेगी। भांय भांय करती वादियों और गरजते पहाड़ों के बीच बनी हुई संकरी सी मौत की सड़क से गुजरने वाले सैन्य रसद से लदे ट्रकों का ड्राइवर जब हर नागरिक बनेगा, तब उसे देशभक्ति के जज़्बे की पाकीज़गी का एहसास होगा। जब हम और आप 30-35 किलो का एयर बैग और बंदूक पीठ पर लादे, 15-20 किलो की कुल वर्दी पहने लद्दाखी बर्फ के बियाबान वनों मे भूखे प्यासे दो चार दिन भी भटक लेंगे तो जान जाएँगे कि देशभक्ति की उदात्त भावना किसी तिरंगे या अशोक चक्र की गुलाम नही होती। ये तो उस जज़्बे के प्रतीक मात्र हैं जो अपने लिए हमी ने चुने हैं। देश का हर आदमी जब सैनिक भी होगा तभी वह जानेगा कि ठीक ठीक देशभक्ति वास्तव मे कोई बाज़ार नही होती, असल मे तो वह एक संस्कार होती है, जो अपनी राष्ट्रीयता की गौरव गाथाओं के साथ हरेक को किशोर मन से ही मिलना शुरू हो जाती है। लफ़्फ़ाजियों और नारेबाजियों से अलग, जब हर आदमी देशभक्त होने के खतरों से जूझेगा, तभी समझेगा कि केवल विचार अलग होने के कारण किसी की देशभक्ति की भावना पर सवाल उठाना, देशभक्ति की अपनी ही गरीब समझ का प्रदर्शन करना मात्र है।

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