खबर है कि वाराणसी मे मेट्रो रेल मार्ग जो लगभग 30 किलोमीटर की कुल लंबाई का होगा,वह दो बार वरुणा नदी के नीचे से होकर गुजरेगा। वरुणा की तलहटी से 20 मीटर नीचे भूमिगत सुरंग कि खुदाई किए जाने की योजना है। बताया गया है कि बनारस मे कुल भूमिगत मेट्रो मार्ग लगभग 20 किलोमीटर और ज़मीन के ऊपर लगभग 10 किलोमीटर का होगा।
इस समचार ने हमारा यह विश्वास और पुख्ता ही किया है कि हमारी सरकारें और हमारी व्यवस्था देशी विदेशी पूँजीपतियों और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक शक्तियों के नियंत्रण मे काम करती हैं। जनहित के नाम पर तो केवल मक्कारी होती है। हर जगह और हर स्तर पर सरकारी तंत्र बड़ी सावधानी से जनहित के खिलाफ खड़ा है। असि नदी को पाट-पाट कर कॉलोनियाँ बना लेने वाले और नाली बनी नदी के प्रवाह मे पुलिया डालकर उसके ऊपर निर्माण की योजनाएं बनाने वाले वाराणसी विकास प्राधिकरण से मिलीभगत करके वाराणसी नगर निगम ने इन अवैध मकानों और कॉलोनियों मे बिजली पानी के 'वैध' कनैक्शन तक दे रक्खे हैं और हाईकोर्ट मे हलफनामा भी दे रक्खा है कि उक्त सारे निर्माण ध्वस्त कर दिये गए हैं।
भू पर्यावरणविद और नदी विशेषज्ञ प्रोफेसर यूएन त्रिपाठी कहते हैं कि 6 से 8 फीट की खुदाई करके देखिये,असि नदी का सोता अभी जीवित मिलेगा। इन सारे अवैध निर्माणों को हटाकर नदी की तलहटी मे खुदाई करके असि को आज भी ज़िंदा किया जा सकता है यह उनका शोध है। प्रदेश सरकार भी कहती है कि असि और वरुणा का पुनरुद्धार सरकार की प्राथमिकता मे है,जबकि इधर नगरनिगम ने नदी के गर्भ मे से होकर सीवरों का जाल बिछा रक्खा है।
कुल मिलाकर ये स्थानीय निकाय प्रशासन और राज्य सरकार के विभागों के कथनी करनी के दोहमच ने असि नदी को पूरी बेशर्मी से मार डाला है और दूसरी तरफ असि को बचाने के लिए इन्ही लोगों के बयानों से अखबार पटे पड़े रहते हैं। हमारे दौर की यह भयानक सच्चाई है कि पौराणिक वरुणा नदी मे भी अब केवल रासायनिक कचरा और सीवर बहता है। कूड़ों के ढेर से वरुणा किनारे की जमीने भी पाटी जा रही हैं, घर यहाँ भी बनाए जा रहे है, कॉलोनियाँ यहाँ भी बसाई जा रही हैं और अब करेला नीम पर चढ़ेगा। विकास के लिए ज़रूरी मेट्रो रेल योजना दो स्थानों पर वरुणा के भूजल स्रोत को काटेगी।
निश्चित रूप से ये दो अवरोध नदी का ज़्यादा कुछ नही बिगाड़ पाएंगे। लेकिन अगर ये हुआ तो ये मरते हुए को और मारना तो होगा ही। कैसा भयावह समय है...! समझ मे यह आता है कि जनहित के खिलाफ जाना हो तो सरकारें नदी के 20 मीटर नीचे भी उतर सकती हैं। सोता टूटेगा तो है ही, नदियों के मरने का परिणाम भी अब सामने है। वाराणसी और आस-पास के जिलों मे ही नही ,लब्बोलुआब यह कि उत्तर भारत के अनेक प्रदेशों,जिलों, शहरों और गांवों मे नदियों का स्वरूप बिगड़ने से भूजल स्रोत दस से बीस फिट तक नीचे भाग गया है। हमारे पूर्वाञ्चल मे पुराने हंडपाइप,नलकूप और बचे खुचे कुओं मे पानी इतना नीचे चला गया है कि नयी बोरिंग्स हो रही हैं और हर आदमी सबमर्सिबल लगवा रहा हैं।
बेतहाशा दोहन और कम बारिश के चलते भूजल स्तर की लगातार गिरावट ने उत्तर भारत मे अभी से जल संकट के खतरनाक संकेत देना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, यूपी, हिमांचल प्रदेश व उत्तराखंड के कुछ इलाकों मे जिस स्तर तक भूजल मे गिरावट देखी जा रही है, उससे गर्मियों मे पेयजल संकट के हालात बन सकते हैं।
यूपी के झांसी,आगरा,फीरोजाबाद,और मैनपुरी मे भूजल के हालात बिगड़ चुके हैं। हरियाणा के आठ जिलों व पंजाब के कुल 137 मे से 103 ब्लॉक डार्क जोन बन चुके हैं। उत्तराखंड के कई तराई इलाकों मे भी बीते 15 वर्षों के दौरान भूजल स्तर मे तीन मीटर तक की गिरावट दर्ज हुई है, जबकि हिमाचल प्रदेश के ऊना व सिरमौर जिलों के अधिकतर क्षेत्र क्रिटिकल जोन चिह्नित हो चुके हैं। इन क्षेत्रों मे नये ट्यूबवेलों की मंजूरी तक रोक दी गयी हैं। झांसी के अलग अलग हिस्सों मे पानी एक से छह मीटर तक नीचे जा चुका है। पूरे बुंदेलखंड मे भी कमोबेश यही स्थिति है।
आगरा के 15 मे से 11 ब्लॉक डार्क जोन मे है। फीरोजाबाद मे नौ मे से पाँच ब्लॉक डार्क जोन मे जा चुके हैं। मैनपुरी के नौ ब्लॉक मे से दो ब्लॉक डार्क जोन मे हैं। गाजियाबाद मे हर साल पाँच से आठ फीट तक भूजल स्तर गिर रहा है। सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि यूपी को गर्मियों मे भीषाणतम पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है। हरियाणा के लगभग आठ जिले डार्क जोन घोषित हैं और उन्नीस जिलों से पचहत्तर फीसदी भूजल निकाला जा चुका है। उत्तराखंड की तराई मे भूजल स्तर 15 सालो मे तीन मीटर नीचे गिरा है। इसका कारण उद्योगों के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन है।
इन भयावह आंकड़ों की रोशनी मे ध्यान से देखिये तो एक तरफ सरकारें जल संकट पैदा करने वाली तमाम योजनाएँ लागू कर रही हैं, दूसरी तरफ पैदा होने वाले भीषण जलसंकट के आंकड़े जारी कर रही हैं। इसे ही मक्कारी और बेशर्मी कहते हैं। और यह मक्कारी डंके की चोट पर की जा रही है। जनता की सरकारें जनहित के विरुद्ध ताल ठोंक कर खड़ी है और हम उनकी मदद कर रहे हैं। देश मे जनता का राज है,यह मरसिया भी लगातार गाया जा रहा है। बिलकुल सच लगता है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के ही सवाल पर होगा।
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