गांवों को आपस मे जोड़ने के लिए पगडंडियाँ होती हैं लेकिन शहरों को आपस मे जोड़ने के लिए खूब लंबी, खूब चौड़ी और खूब चिकनी सड़कें होती हैं। इन सड़कों की लंबाई जोड़ लीजिये तो पैंतालीस लाख किलोमीटर्स से ज्यादा बड़ा नेटवर्क है। करीब सवा लाख किलोमीटर से अधिक है रेल लाइनों का नेटवर्क और नदियों का क्षेत्रफल 32 लाख वर्ग किलोमीटर्स से भी बड़ा है। लेकिन कहना केवल इतना है कि देश की सारी छोटी बड़ी नदियों, रेलवे ट्रैकों और लंबी लंबी इन सड़कों के इस संयुक्त नेटवर्क से कहीं बहुत ज्यादा और कहीं बहुत बड़ा है अपना भारत। ऊंचे ऊंचे भवनों और आश्चर्यजनक रूप से आसमान छूती अट्टालिकाओं का तो कहना ही क्या...! कभी कभी तो परिंदों और जहाजों की परवाज़ की राह मे आ जाते हैं इनके कंगूरे। नीचे से देखना शुरू करिए तो ऊपर पहुँचते पहुँचते उलटकर दोहरे हो जाते हैं देखने वाले। एवरेस्ट पर चढ़ जाइए तो सारी दुनिया कदमों मे पड़ी नज़र आती है। लेकिन यहाँ भी वही कहना है। इन ऊंचाइयों से कहीं बहुत ज्यादा, कहीं बहुत ऊंचा है अपना भारत। कूपों की गहनता और तड़ागों से भरा देश, नदियों, झरनों और झीलों की गहराई से लबरेज सरजमीं और लहर मारते अपने सागरों के गर्भ गह्वर की कोई तुलना है क्या...! लेकिन फिर वही बात कि इन गहराइयों से कहीं बहुत ज्यादा, कहीं बहुत गहरा है अपना भारत। ये आनंद वनों की भूमि है, ये नन्दन काननों की जमीन है। ये पर्वतों और पठारों की वसुधा है। ये रेतीले राजस्थान और बर्फीले लद्दाख की, दक्षिण के सरसराते ताड़वन और उत्तर के गांगेय मैदान की, विस्तृत समुद्री तटों और जंगलों की धरा है। लेकिन फिर कहना है कि इन विस्तारों से कहीं ज्यादा और कहीं व्यापक है अपना भारत।
इस लंबाई, इस चौड़ाई, इस ऊंचाई, इस गहराई और इस विस्तार की बात वो बात ही न रह जाय, जो हम बचपन से सुनते आए हैं। इस विस्तार को देखना, इस गहराई को महसूसना और इस ऊंचाई पर निरंतर निगहबानी रखना कोई सरकारी ड्यूटीमात्र नही, हमारा नागरिक धर्म भी है। कुछ कमजोरियाँ रह गयी हैं। इन कमजोरियों के बावत आइये कुछ तय करें। तय कीजिये कि कर्क, मकर और विषुवत रेखाएँ बनी रहें पर गरीबी रेखा मिट सके तो मिट जाये। तय कीजिये कि ऊंचे बुर्जों पर दीपशिखाएँ रोशन रहें पर झोपड़ियों मे दिये जल सकें तो जल जाएँ। तय कीजिये कि पकवानों और भोजों का मेला चलता रहे, पर भूखे पेटों को रोटी मिल सके तो मिल जाये। तय कीजिये कि अफसरों, नेताओं, शिक्षितों और विद्वानों की फौज निकलती रहे पर निरक्षरों और अनपढ़ों की फौज भी दो अक्षर पढ़ सके तो पढ़ जाये। आइये तय करें कि महलों मे हंसी बिखरती है तो बिखरती रहे पर वंचितों के होंठों पर भी मुस्कान खिल सके तो खिल जाये। आइये तय कीजिये कि प्रेम के उत्सव मनते रहें, रागिनियों के महोत्सव सजते रहें पर नफ़रतों की जंग रुक सके तो रुक जाये। ये तय करने का दिन है कि पोषण हरेक का अधिकार हो और शोषण से मुक्त ये संसार हो। तय करने का दिन है कि हर देहरी का सम्मान हो, मन चाहे जितने सुरक्षा के सामान हों पर हर लड़की को, हर महिला को सांस लेने भर खुला आसमान हो। हर गण के ऊपर एक तंत्र न हो, गणतन्त्र दिवस की इस पावन बेला मे आइये तय कीजिये कि हर तंत्र के सिर पर एक गण हो। तय कीजिये कि मनोमालिन्य की धूल छूटे, हमारे हृदयों मे परस्पर प्रेम के अंकुर फूटें। हवा मे गुल हो, गुलशन हो, बहार हो। कुछ सामूहिक कर्म हों, कुछ सामाजिक शर्म हो, कुछ राष्ट्रीय धर्म हों तो देश ये गुलज़ार हो।
तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ॥
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ॥
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