Saturday, 19 March 2016

अनगढ़ सी फीलिंग

एक अजीब सी, अनगढ़ सी फीलिंग है। आप सबसे शेयर कर रहा हूँ। मन मे कई कई कोने होते होंगे। किसी कोने मे अतीत का कोई टुकड़ा बसा रहता है तो किसी कोने मे सपने का कोई टुकड़ा पड़ा रहता है। किसी कोने मे कोई सुख फुदक रहा होता है तो किसी कोने मे कोई दुख फड़क रहा होता है। किसी कोने मे हम सबका बचपन पड़ा होता है तो किसी कोने मे हमारा ही किशोर अपनी मसें भिंगो रहा होता है। किसी कोने मे हम सभी बूढ़े हो रहे होते हैं तो किसी कोने मे जवानी फट रही होती है। किसी कोने मे घुटनों चलतीं, बात बेबात रोतीं और हाथ हाथ हँसती, काजल से लदफद अपनी ही दो आँखें पड़ी होती हैं तो किसी कोने मे छूटे हुए अपने उनके नैन सैन मटक्के पड़े होते हैं। किसी कोने मे बुढ़ापे की लाठी तो किसी कोने मे कुछ अपने ही भग्नावशेष भी रखे होते हैं हम। मन के किसी कोने मे अपनी ही मृत्यु, मृत्यु से भय, अपना ही मृत शरीर और मृत्यु के बाद की उड़ान, तमाम आशंकाए और कल्पनाएं भी पड़ी होती हैं। छियालीस साल की इस उम्र मे देखता हूँ कि मेरे मन के वे कोने ज्यादा जागृत और सक्रिय हैं, जिनमे बचपन है, युवावस्था है और एक वो दौर है, जब ज़िंदगी खुद से बड़ी लगती है। दुनिया भी इस उम्र मे अपनी उम्र से बड़ी लगती थी। लेकिन अब जबकि उम्र को कुछ ठहरकर महसूस करना चाहिए, तब न जाने क्यो जगत वृद्ध लगने लगा है। ....और मन है कि वहीं का वहीं खड़ा है जहां, बीस साल की उम्र मे चालीस साल की उम्र वाला अपने से बड़ा लगता था...! तभी तो आज भी लगता है। उम्र बदली, जमाना बदला, लेकिन आँखें कहाँ बदलीं। ये तो वही आँखें हैं। उन्हे आदत है पकती पीढ़ी वाले को अंकल कहने की। डाली मे फूल लिये मंदिर की ओर जाती दो चार पके बालों वाली औरतों को आंटी कहने की। आँखें वैसे ही आज भी देखती हैं। हममे से अनेक अपने से छोटी उम्र वालों को भी अंकल आंटी समझ लेते हैं ... न हुआ तो कह भी देते हैं smile emoticon जबकि वे हमारे बेटे बेटी जैसे हो सकते हैं। अब आँखों को भला इस बात से क्या मतलब कि आपकी उम्र बढ़ रही है या घट रही है। वो तो आपको अपने दिमाग से पूछना पड़ता है। वो बताता है कि अंकल आंटी वो नही, आप हैं जी... smile emoticon

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