Saturday, 19 March 2016

तुम्हें श्रद्धांजलि नही दूंगा

अरोड़ा जी के बाद उनकी बेटी रचना अरोड़ा ने गाँडीव की ज़िम्मेदारी संभाली और मुखपृष्ठ पर सम्पादकीय लिखना शुरू किया। परंपरा से उलट हर सम्पादकीय के साथ अपनी फोटो भी छापनी शुरू कर दी। गाँडीव बनारस का प्रतिष्ठित सांध्यकालीन दैनिक रहा है। संपादक बनी तो रचना को भक्त टाइप फीलिंग आने लगी और इस बहाव मे लड़की बह निकली। हर सम्पादकीय ऐसे जैसे बुद्धि और विवेक से कोई वास्ता ही न हो बस मोदिमीनिया मे जकड़ी जमात की आवाज मे आवाज मिलाने लगी। छोड़ दिया मैंने उसे पढ़ना ही जो भक्तउवाच से ज्यादा कभी कुछ था ही नही। लेकिन आश्चर्य हुआ कल अचानक एक स्टाल पर दिख गया गाँडीव तो उसके सम्पादकीय शीर्षक पर नज़र चली गयी। हैं....ये क्या लिखा है! टूट रहा है इंद्रजाल। ये अचानक किसका इंद्रजाल टूटने लगा। पूरा पढ़ा तब जाकर पता लगा कि दाता ने उसे उतनी शक्ति ही नही दी और उसके मन का विश्वास कमजोर पड़ गया। विश्वास कमजोर होते जाने का ये मामला अब राष्ट्रीय स्वरूप लेने लगा है। तिलिस्म टूट रहा है। महानायकत्व भंग हो रहा है और हमारे भोले भण्डारी भक्तजन की भंगिमाएँ बदल रही हैं।
दरअसल उम्मीदों के इस नकली पहाड़ का टूटना ही उसकी नियति थी। रोहित वेमुला उसी टूटे हुए पहाड़ का एक शिलाखंड है। एक अकेली जान के सामने नियंत्रणविहीन वानरसेना। लड़ते, टकराते, गिरते, पड़ते, जूझते, थकते आखिर ढह गया ये शिलाखंड तो केवल इसलिए कि उसके नीचे कोई जमीन नही बची थी। अब असहिष्णुता को इस ताजे पैमाने पर कसिए। देखिये वहाँ घमंड से ऐंठी एक ऐसी दुःसह चट्टान मिलेगी जो हर व्यवस्था विरोधी के सामने खड़ी कर दी गयी है। ये प्लेयर टू प्लेयर गेम है। हर खिलाड़ी के पीछे एक खिलाड़ी खड़ा कर दिया गया है। ये कहकर कि धराशायी हो जाने की हद तक मारो। इस हद तक मारो कि मर भी जाय तो कोई गम नही। ख्याल रहे ऐसे हर इंद्रजाल के पीछे झूठ और नियोजित झूठ का एक बड़ा कारोबार होता है और पूरे कारोबार पर गाढ़ा काला एक पर्दा डाल के रखा जाता है। आइये देखिये जमूरे मंच पर हैं और काले पर्दे की आड़ से तमाशा देखने की पूरी सुविधा है। तमाशा देखिये कि संस्कार नग्न और परम्पराएँ मजबूत की जा रही हैं। सदियों पुराना आदमखोर जबड़े खोल रहा है और जिसके नीचे से उसके हिस्से की जमीन खींच ली गयी, वह पूरा का पूरा शिलाखंड उन आततायी जबड़ों मे समा रहा है।
तमाशा देखिये कि जिस देश मे सिर्फ दो पूँजीपतियों पर दो लाख करोड़ का कर्ज व्यवस्था पचाये बैठी हो, उस देश के करोड़ों युवाओं को दस हजार करोड़ का स्टार्टअप दिया जाता है। तमाशा देखिये कि जिस देश मे मेक इन इंडिया के नारे को मंत्र की तरह भुनभुनाया जाता हो, उस देश का प्रधानमंत्री विश्व रिकॉर्ड बनाने की मंशा से 22 जनवरी को दस हजार ऐसी ट्राईसाइकिल्स बांटने बनारस आ रहा है, जो चीन मे बनी हैं और जिनकी डिजाइन इंग्लैंड मे बनी हैं। तमाशा देखिये कि राष्ट्र डूब चुका है लेकिन उसका निर्माण हो रहा है। निर्माण हो रहा है फर्जी नारों से, फर्जी योजनाओं से, फर्जी तिलिस्मों से और फर्जी संकल्पों से। तमाशा देखिये कि एक शोधार्थी ने आत्महत्या कर ली है और देश के नाम एक चिट्ठी लिखी है, जिसमे उसने अपने तमाम दोस्तों और दुश्मनों को माफ किया है। तमाशा देखिये कि एक रोहित के शव के सामने बौना पड़ गया है एक पूरा देश, एक पूरा समाज और एक पूरा तिलिस्म। तमाशा देखिये कि उसके लिखे शब्दों मे ऊभ चूभ हो रहे हैं संवेदना के तार। .....और तमाशा देखिये कि वो कायर था, वो कायर था, वो कायर था। अरे छोड़िए कि वो कायर था कि बहादुर था कि शहीद था। वो विक्टिम था यही कौन सी कम बहादुरी है। याद रखिए सिर्फ इतना कि उसे जीने नही दिया आपने। उसे मारा आपने। आप एबीवीपी हैं या आप बीजेपी हैं या आप आरएसएस हैं, आपको सिर्फ इतना ही मालूम है। जबकि उस अभागे को लगा होगा कि आप सरकार भी हैं।
जाओ रोहित...! फिर भी कहूँगा कि तुमने अच्छा नही किया। तुम्हें श्रद्धांजलि नही दूंगा, मै चाहूँगा कि तुम्हें नर्क या स्वर्ग कुछ भी न मिले। तुम फिर लौटो ....! फिर लौटो भारत मे....!

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