Saturday, 19 March 2016

ये घाट बोलता है.....2



 
मुझे लगता है इन घाटों पर सोलर एनर्जी की कम रोशनी ही रहे तो नदी को सुहाना लगेगा। वह खुद को उस रेलगाड़ी की तरह महसूस करेगी जो सरकते सरकते एक मद्धिम-सी रोशनी वाले शांत-से किसी गंवई स्टेशन पर पहुंची है। मुझे यह भी लगता है कि घाटों का सुंदरीकरण बनारस के मिजाज के मुताबिक उसके अनुकूल आधारों पर किया जाना चाहिए। सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, कलात्मक, ऐतिहासिक किसी भी नज़र से देखिये तो अपनी इन विरासतों मे बहुत सम्मृद्ध है बनारस। मुझे लगता है कि बनारस के सभी प्रतीक इन घाटों पर उतार दिये जाने चाहिए। घाट-घाट पर सोलर एनर्जी की रोशनी हो। हर घाट पर अपनी विरासत का एक सुशील किन्तु प्रभावशाली प्रदर्शन हो और हर घाट पर कम से कम एक घना घनेरा पेड़ हो तो घाटों पर ज़िंदगी आ लौटे। जैसा कि महिषासुर घाट पर देखा मैंने आज। उस अस्सी घाट पर देखिये तो ज़िंदगी की हुकूमत चलती है। बनारस का ये एकमात्र ऐसा घाट है जहां चौबीस घंटे का मेला रहता है, लेकिन महिषासुर घाट तो घाटों मे घाट है। मै तो कहूँगा अपने स्ट्रक्चर मे यह बनारस का भव्यतम घाट है। यहाँ सबसे ऊपरी सीढ़ियों पर गुमटियों मे चाय और पान की दुकानें हैं। खास बात ये कि वहीं दुकानों के सामने दो चार पुराने पाकड़, पीपल और नीम के पेड़ भी लहराते हैं। यह मोहक दृश्य है। मन इन पेड़ों की छांव मे चिपक के रह जाता है। सोचता हूँ काश इन पेड़ों का रकबा हर घाट पर फैल जाता तो इन पेड़ों पर कितनी सारी चिड़ियों के घर होते। महिषासुर घाट के इधर इस कोने मे देखिये किसी ने नीम और पाकड़ के ही दो और पौधे लगा दिये हैं। सालभर से ऊपर के होंगे ये पौधे। किसी ने उसके चारो तरफ ईंटों का चौकोर जालीदार ट्री गार्ड भी चिनवा भी दिया है। मुझे खुशी हो रही है कि कोई है जो अभी भी इतना जागरूक बचा हुआ है, जो बाज़ार के इस आत्मघाती वेग से जरा परे हटकर अपने ही नेपथ्य मे खड़ा हुआ है। एक कोई और भी है जिसने दोनों गाछों के ऊपर फुनगियों मे एक लाल तिकोना झण्डा बांध दिया है। अब ये काली माई के किसी मंदिर-सा भरम देता है। अब धार्मिक कारणों से ही सही, पर इसको कोई नुकसान नही पहुंचाएगा। महिषासुर घाट पर जितनी रौनक रहती है, उसमे चार नही, आठ-आठ चाँद लगाता है ये विशाल और भव्य रविदास मंदिर, जिसकी तीसरी मंजिल की ऊपरी छत पर एक खूबसूरत लॉंन बना रखा है। संत रविदास की अनहद बानी के पाठ मंदिर की दरो दीवारों पर खुदे हुए हैं। ठीक बीचोबीच मंदिर के गर्भगृह मे स्थापित संत की बीतराग प्रतिमा आपका सारा आकर्षण चुरा लेती है। आप देखते ही रह जाएँगे अपलक...निर्निमेष...वह मुद्रा कि जैसे एक प्रशांत-सी उद्विग्नता हो, जिसे कलाकार ने मूर्ति की मनःस्थिति मे अपनी छेनियों से उकेर दिया है। अनुयायी देशभर से ही नही, दुनिया भर से आते हैं। बेहद अनुशासन-भाव मे दिखने वाले ये रविदास भक्त अपनी अमीरी का कोई भोंडा प्रदर्शन नही करते। एक उल्लासमय शांति चारों ओर बिखरी पड़ी मिलेगी। कोई गंदगी नही। बेहद साफ शफ़्फाक मंदिर और उसके विशाल प्रांगड़ की स्वच्छता और मनमोहकता आँखें फाड़कर देखने और अनुकरण करने की वस्तु है। यहीं बगल मे ऐतिहासिक रानी महल कोठी है। सफ़ेद रंग की भव्य और नक्काशीदार ये कोठी आज भी काशी स्टेट की प्रॉपर्टी है। राज परिवार जब नगर मे आता था तो विशेष अवसरों पर इस महल का उपयोग महारानी के निवास के लिए होता था। घाट की तरफ से देखिये तो ये पीछे वाले बुर्ज का हिस्सा दिखाई देता है। पूरी तरह सुरक्षित और सबसे अधिक ऊंचाई पर बना हुआ राजसी आभा से युक्त यह ऐतिहासिक महल अब किराये पर उठा दिया गया है। कई सारे किरायेदार हैं। प्रतीकात्मक किराया राजकोष मे आज भी जमा कराया जाता है। इधर लेकिन पेड़ नही दिखते। ...और पेड़ चाहिए। ...और छांव चाहिए-ये हर घाट बोलता है।

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