इसके बाद नाक भौं सिकोड़िए अब। न हो तो जेब से रुमाल निकाल लीजिये और नाक पर जमाकर आगे बढ़िए। आप प्रह्लाद घाट कि ओर बढ़ रहे हैं। पिछले हफ्ते हुई हल्की बारिश के कारण गंगा का पेटा भी हल्का सा भरा हुआ है। पर यह अपने साथ बहुत सारी गंदगी भी बहा लाया है। घाट से खिसक रहा गंगा का किनारे वाला पानी पोलिथीनों, कपड़ों,फूलों, मालाओं और कचरे से पटा पड़ा है और प्रह्लाद घाट के बाद गायघाट से पहले वाले घाटों पर बाप रे बाप...! मानव मल से लिथड़े हुए घाट। सभी की सभी सीढ़ियों पर-नीचे से ऊपर तक हर मढ़ी टट्टीखाना बनी हुई है। मल और पेशाब की दुर्गंधयुक्त दस बीस नालियाँ पूरे घाट पर गंगा मे मिल रही हैं। इस घाट को पार करते हुए आप चल नही रहे होते हैं, कूद-कूद कर दौड़ रहे होते हैं। यूं भागते-भागते भी एक नज़र ऊपर डाल लीजिये। मलाहिन महिलाएं सूखे हुए अरहर के डंठलों और बांस की कइन को मोड भिंगोकर टोकरियाँ बना रही हैं। खाँची-खंचोले बिन रही हैं। ...और गंदगी के इस पूरे साम्राज्य और दुर्गंध से विरक्त अपने काम मे डूबी हुई हैं। उनकी गलचौर नही सुनी जा सकती क्योंकि आपको तो जल्दी पड़ी है। नाक बंद है और अगली सांस लेनी है तो आपको जल्दी से जल्दी ये घाट छोड़ देना है। यहाँ से भाग लेना है। सांस लेने के लिए खुली हवा खोजनी है। लेकिन ये मुई सांस लेने के चक्कर मे भागते भागते आपके देखने से दो खास चीजें रह जाती हैं। एक वो आठ फीट ऊंचा शिवलिंग जो प्रह्लादघाट के अलावा बनारस भर मे भी और कही नही है। और दूसरा वह दृश्य जिसमे पीछे की ओर मुंह करके खाँची बीनती हुई औरत की छती चूसती हुई सामने को मुंह किए डेढ़ दो साल की ये गबदू-सी बच्ची सीढ़ियों पर लटकी हुई है।
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