इधर आपकी रुमाल जेब मे गयी उधर आपके मुबारक पाँव गायघाट की जमीन पर पड़े। यहाँ से लेकर गोलाघाट तक पूरा किष्किंधा वन समझिए। बंदरों का साम्राज्य है पूरा। यह विशाल पीपल का पेड़ तो जैसे अरण्य है उनका। उधर अखाड़े और उसकी छतों पर, नीचे ऊपर चारों तरफ खाते, बिचरते, उछलते, चिचियाते, किटकिटाते, दौड़ते, भागते हुए तरह-तरह के छोटे-बड़े बंदर हैं। छोटे बच्चे, बड़े बच्चे, पति लोग, उनकी पत्नी बेगमें, माताएँ, बाबा, आजी सभी हैं इनमे। किसी छोटे-से बच्चे बंदर को कोई तगड़ा-सा युवा बंदर थपड़िया देता है तो उसकी प्रौढ़ा माँ उस ढीठ युवक बंदर को पेड़ से खंभे तक दौड़ा के मारती है। तभी उधर से एक बुजुर्ग बंदर खौखियाता है। अब घर गाँव के बुजुर्ग बंदर को अचानक सामने आया देखकर ये माई बंदरिया उस दुष्ट युवक बंदर का मुंह छोडकर जरा आड़ मे होकर लजा जाती है बेचारी। पीपल का पेड़ घना है और सैकड़ों डालियाँ हैं उसकी। हर डाली पर दो चार बंदर तो हैं ही हैं। एक वो उधर है देखिये। केबल वायर से लटका हुआ फेंका हुआ पोलीथीन का थैला खोल के देख रहा है। कुछ काम का नही मिला शायद तो नोच के फेंक दिया है। इधर ये बुजुर्गवार महाशय फेंके हुए पाउच मे से टोमैटो सॉस के साथ फेंका हुआ समोसा पा गए हैं और उसी मे मगन हैं। उधर नीचे की सीढ़ियों पर खिली धूप मे शायद बहू बंदरियों की चौपाल चल रही है। करीब आधियों के साथ तो उनके बच्चे भी हैं। कोई दूध पिला रही है, कोई ढील हेर रही है, कोई लेट के धूप स्नान कर रही है तो कोई पीठ पर, कोई पेट मे अपने-अपने बच्चों को चिपकाए टहल रही है। इसी जगह कुछ देर बैठकर ये महसूस होता है कि सामने से गुजर रहे काला धुआं उगलते इन स्टीमरों को अगर सौर ऊर्जा से चलाया जा सकता तो घाट का यह जिंदा वातावरण बचाया जा सकता। साथ लाया हुआ लाई का पैकेट जलचरों के लिए गंगा के पानी मे और चने का पैकेट इस बंदराबाद के लिए घाट पर बिखेरकर मै शहर मे घुस जाता हूँ। दूसरी बेचैनियां आवाज देने लगी थीं। .......हैं और भी गम जमाने मे मुहब्बत के सिवा.....!
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