Saturday, 19 March 2016

फगुआती भी है नदी

प्रकृति की घटनाओं मे आपसी सम्बन्धों की लय देखते ही बनती है। गंगा के किनारे रहने का सौभाग्य मिला है। घाटों पर पहुँचने का मन मिला है। किसी न किसी गंगा घाट से रोज ही निकलता हूँ। घाट का जीवन देखता हूँ। प्रकृति के परिवर्तन देखता हूँ। मनुष्य जीवन और प्रकृति की सूक्ष्म प्रवृत्तियों पर भी नज़र पड़ती है। गंगा आजकल शांत है। आज हिन्दी फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष नवमी है। गंगा इस बीच के समय मे शांत ही रहती है। नदी का समय के साथ एक गहरा नाता है। दशमी और एकादशी भर नदी तैयारी करती है फिर द्वादशी,तेरस और चतुर्दशी को शुरू करके अमावस के दिन तक लहराने लगती है नदी। लहरें और लहरों मे तरंगें अमावस की नदी की अभिव्यक्ति है। उसके मन का सिंगार है। उसके शरीर का संगीत है। गज़ब ये कि ये हलचल खामोश हलचल है। कहीं कोई हरहर स्वर नही, कोई आवाज नही है। शंकर का आदेश मानती है गंगा। काशी मे शांत बहती है, मन मे कितना भी हाहाकार हो। मन और तन की यह हलचल अगले दिन से फिर शांत पड़ने लगती है और अजोर की अष्टमी तक शांत ही रहती है। नवमी से फिर एक कंपन सा शुरू होता है और पूर्णिमा के दिन तक दिल खोलकर नाचती है नदी। हम आदि केशव घाट के आगे तक जाकर देखते हैं लेकिन तब तक खामोश ही नाचती है। किनारों पर टकराती है। नावों को हिलाती है। स्टीमरों को झुलाती है, जहाजों को डुबाती सी लगती है और अस्थिर सी रहती है गंगा। पूर्णिमा औए अमावस के दिन आपने देखी है कोई नदी...? नोट किया है नदी का व्यवहार। देखा है प्रकृति की अन्य घटनाओं से उसका या उसकी गतिविधि का कोई संकेत...? कहते हैं नदी महीने मे दो बार मासिक चक्र से गुजरती है। फगुआती भी है नदी।

No comments:

Post a Comment