हाँ मै देशद्रोही हूँ .... और नही मै राष्ट्रभक्त नही हूँ, जो लोग भी आज ये कडवे बोल बोल रहे हैं, वो आपकी प्रतिक्रिया मे बोल रहे हैं। आप समझते क्यो नही...! आमतौर पर देखिये तो सड़क पर होने वाला एक्सीडेंट कितना भी भयानक हो, सिर फूट जाते हैं, हाथ-पाँव टूट जाते हैं, बड़े से बड़ा नुकसान हो जाता है, लेकिन आँखेँ अक्सर बच ही जाती हैं। हमलोग सुना करते हैं न- ओह जरा सा बच गयी आँख। गाल पर धंस गया कुछ, माथा छिल गया, पलकें तक कट गईं लेकिन आँख साफ साफ बच गयी। आँखें बच ही जाती हैं अक्सर। आँखें किसी किसी की ही जाती हैं एक्सीडेंट्स मे। वो कोई घोर पातकी ही होगा कि जिसकी आँखें नही बचतीं। ये देशद्रोह भी मुझे ऐसा ही लगता है। आमतौर पर कोई देश विरोधी भी नही होता, देशद्रोही होना तो बड़ी बात है। कोई जनवादी हो सकता है, कोई प्रगतिवादी हो सकता है, कोई विकासवादी हो सकता है, कोई इंकलाबी हो सकता है, कोई नक्सलवादी हो सकता है, कोई आदिवासी हो सकता है, कोई सरकार विरोधी हो सकता है, कोई विचार विरोधी हो सकता है, लेकिन देशविरोधी या देशद्रोही इनमे से आमतौर पर कोई नही होता। जो भी लड़ रहा है, उसके तरीके गलत या सही हो सकते हैं, लेकिन उसे चाहिए तो अपने हिस्से की आज़ादी ही। देशद्रोही कोई बिरला ही हो सकता है। जाहिर है वो कोई घोर पातकी ही होगा...! आमतौर पर जिन्हे आज एक तरफ से देशद्रोही बता देने का चलन चल पड़ा है, उनके जीवन मे झांककर देखिये, इन सबने बचपन मे, विद्यार्थी जीवन मे झंडा फहराने के संस्कार पाये हैं, प्रभातफेरियाँ निकाली हैं, जयहिन्द और वंदेमातरम के गीत गाये हैं। अपनी शर्ट की बटन वाले काज मे छोटे छोटे झंडों की पिन फँसाकर दिन दिनभर खुशियाँ मनाई हैं सबने। कोई बिरला ही होगा जो इनमे से निकलकर देशद्रोही हो गया हो। कन्हैया ने भी किया होगा ये सब। मैंने भी मनाए हैं राष्ट्रीय पर्व और प्यार किया है देश से। लेकिन हम सबका सामूहिक विरोध उस ज़ोर जबर्दस्ती की खोखली राष्ट्रभक्ति से है, जो हमारे आपके सम्मान सहित जीने के अधिकार की कसौटी बनकर उभर रही है। इसलिए आपकी प्रतिक्रिया मे निकलकर एक जवाब आता है कि हाँ, हम नही हैं देशभक्त। बदलिये आप अपनी शैली और कसौटियाँ। वरना वक़्त के साथ साथ साबित होता जाएगा कि देशद्रोह तो आपने किया।
आप कुछ बानगियाँ देखिये। देश मे सहिष्णुता है, है और है....ये चीखते हुए असहिष्णुता की सारी हदें पार हुई जा रही हैं। परसों देश के एक नामी परिवार से एक शख्स ने मेरी पोस्ट पर आकर लिखा कि आप देशद्रोही हो और देशद्रोहियों का मर्दन करना राष्ट्रवादियों का धर्म है। यही है आपके असहिष्णु होने का सबूत और दिमाग के परखचचे उड़े होने का संकेत। विरोधी विचार की पोस्ट लिखने वाला आपका वैचारिक विरोधी है बस, देशद्रोही नही है। राष्ट्रवादी का धर्म किसी का मर्दन नही हो सकता, राष्ट्र की सेवा ही होता है जी। मर्दन करने वाला तो समाज विरोधी होता है, अराजक होता है, अपराधी होता है। अपने को सहिष्णु बताने के चक्कर मे असहिष्णु होते जाना यह आपराधिक प्रवृत्ति है। परसो संसद मे प्रधानमंत्री ने स्टालिन और खृश्चेव का एक जगतप्रसिद्ध किस्सा सुनाया। क्यो सुनाया...? यह बताने के लिए कि हम बोलने की आज़ादी देते हैं। वरना तो हम भी स्टालिन की तरह व्यवहार कर रहे होते। आपने खूब तालियाँ बजाईं। बिना सोचे समझे बजाईं। बस इसलिए बजाईं कि वो बातें आपके नायक के मुंह से निकली थीं। मुझे उस वक़्त संसद मे चन्द्रशेखर की कमी बहुत खली। चंद्रशेखर उस समय संसद मे होते तो प्रधानमंत्री को उनके वक्तव्य के निकलते निहितार्थों के अर्थ समझा देते। अटल जी और चंद्रशेखर के बाद संसद मे वैसी कोई शख्सियत नही बची, जो तड़पता हुआ सच शालीनता से बोल सके। चंद्रशेखर होते तो कहते कि भारत के नागरिक को बोलने का अधिकार संविधान देता है मोदी जी, आप किस मुगालते मे हैं। स्टालिन और खृश्चेव का किस्सा सुनाकर आप जो ये कहना चाहते हैं कि वे तानाशाह थे, सो बोलने की आज़ादी नही देते थे, जबकि हम लोकतान्त्रिक और सहिष्णु हैं सो बोलने का अधिकार देते हैं। यह आपके भीतर की छुपी हुई प्रच्छन्न फासिस्टशाही वृत्ति है। जैसे कि आपके हाथ मे ही हो कि जब चाहें बोलने और जीने पर सेंसर लगा देंगे। देश को याद होगा जब अटल जी ने सोनिया गांधी को और चंद्रशेखर ने नरसिंहाराव को भरी संसद मे फटकारा था। चंद्रशेखर ने जब कहा था कि कॉंग्रेस वालों कॉंग्रेस को बचाओ। इस मौनी बाबा को हटाओ, तब संसद के सन्नाटे मे सांसदों के सांस लेने की आवाज भी साफ साफ सुनी जा सकती थी।
एक बात और कहकर ये बात खत्म करनी है मुझे। कॉंग्रेस वालों, गांधी परिवार से अब मुक्ति पाओ। कॉंग्रेस बचानी है तो लोकतान्त्रिक नेतृत्व खड़ा करो। वरना प्रधानमंत्री अपने पद की डिगनिटी के खिलाफ जाकर भी पप्पू टाइप भाषा मे डायलोग भाँजते रहेंगे कि कुछ लोग बड़े हो जाते हैं, पर समझदार नही हो पाते। कॉंग्रेस के पास नीचे से उभरा हुआ कोई लोकतान्त्रिक नेतृत्व होता तो इस बात का जवाब यूं देता कि कुछ लोग प्रधानमंत्री जितने बड़े पद पर जाकर भी बड़ों को सम्मान देने की नसीहत देते हुए अपनी राजनीतिक गोटियाँ फिट करते हैं और खुद छोटों के योग्य भाषा का इस्तेमाल करना नही जानते। कुछ लोग बिना बड़े हुए ही इतने समझदार हो जाते हैं कि खुद को हिमालय से कम नही समझते। ......और बेचारा हिमालय सिहर उठता है।
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