बसंत की उमर नयी सदी मे 16 साल हुई है । मसें भींग रही हैं। मुश्कों मे मछलियाँ और जांघों मे मगरमच्छ उभरने लगे हैं। चाल मे मस्ती और कदमों मे तेजी की धमक है। दस्तक सुनाई पड़ने लगी है। वेलेंटाइन वीक भी कल से खूंटा गाड़ेगा। बच्चे लोग इस वीक भर और बुड्ढे लोग इस दो महीने भर पगलाए रहेंगे। (हमारे तो खैर अभी आमूल चॉकलेट खाने के दिन हैं। गये नही दिन बचपन के, आए नही दिन लाठी के smile emoticon ) ये दस्तक भी कुछ इसी तरह की है-पगलाई-पगलाई-सी। खुद बसंत भी सदियों सदियों से आता है तो बौराया हुआ ही आता है। हमने देखा है ऋतुराज के आने की सूचना देती चलती पछुआ हवाओं का ज़ोर थामे नही थमता। रह रह के झटके देती हों जैसे। और जैसे कि इन्हे बह के उस पार कहीं नही जाना हो, सीधे बस नथुनों से टकराना हो और दिल को थरथराते , जिगर को चाक करते, जान को छूते, सहलाते आपके भीतर ही रह जाना हो। लेकिन इस बार लगता है कि हवाओं ने अपनी यात्रा कैंसिल कर दी है। खुश होने के लच्छन नही दीखते। पछुआ हवाओं ने अपनी जगह पश्चिमी विक्षोभ को भेजा है। ये पछुआ हवाएँ और ये पश्चिमी विक्षोभ वैसे तो आपस मे पड़ोसी ही हैं, लेकिन पटती बिलकुल नही इनकी। हवाओं की अदा दूसरी ही होती है, विक्षोभ का आतंक दूसरा ही होता है। हवाओं के मुहल्ले मे ये कोई नया लोफ़र आ बसा लगता है। इसे खाली टकराना आता है ...या फिर बरसना आता है। ये हिचकोले नही देता, धक्के मारता है बेसहूर। ये खुद ठंडा होता है.....और सबको ठंडा कर जाता है। लेकिन हवाओं को बसंत के संदर्भ पता होते हैं। smile emoticon इसलिए पहले उनके झोंके आते हैं। ये झोंके कलियों मे रस भरते हैं, फूलों मे पराग भरते हैं और फलों मे आग भरते हैं। ऋतुराज के ये दो महीने इन्ही रसों, इन्ही परागों और इन्ही आगों की कहानी होते हैं। और सदियों बूढ़ी इन अमराइयों का तो कहना क्या....! बसंत का पहला हिंडोला यहीं उतरता है। मत्त भ्रमर कुंजरों की आहट पाकर अमराई बाहें खोल रखती है, लेकिन निगहबानी तितलियों की होती है। अब ये जो समां बनता है, हम कलम वाले यहाँ बहुत टूटते हैं। हर कलम वाला यहाँ से कुछ न कुछ जरूर चुरा ले जाता है। कुछ याद आ रहा है। सोलह साल के बसंत की रजस्वला अमराई मे पछुआ हवाओं ने कुछ नए नवेले मादक-मादक झोंके भेजे हैं।....और कोई सीधी सादी नही, गौर से देखिये रंगीन-रंगीन तितलियाँ पहरे पर हैं। ये तितलियाँ नशे मे भी हैं। अमराई का पहरा खतरे मे है। इन झोंकों मे नशा है। एक तरफ से सब शिकार हो जाते हैं। तितलियाँ फूलों की तलाश मे हैं.., भौंरे कलियों की तलाश मे। वाह क्या बानक बना है...! पछुआ के झोंके मौसम बुहार रहे हैं। भौंरे माहौल बना रहे हैं। तितलियों के आगोश मे फूल इतराने लगे हैं। बसंत का रथ चल चुका है। अमराई अलसकर नहाने चली है। सदियों बूढ़ी अमराई को 16 साल के बसंत से गर्भिणी होना है...............! गर्भिणी कोई भी हो, उसे प्रणाम करना चाहिए। ये विक्षोभ हटे तो पछुआ चले तो बसंत आए....!
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