किसी पुरुष का एकनिष्ठा व सम्पूर्ण समर्पण के साथ पूरा का पूरा किसी स्त्री का हो जाना, भारतीय स्त्री के जीवन की बड़ी घटना है। क्योंकि वह सामान्यतः ऐसी ही निष्ठा रखती है और ऐसी ही निष्ठा चाहती है। वैसा नही हुआ तो खंडित आस्थाओं के पुरुष भी स्त्रियाँ पचा लेती हैं लेकिन खंडित आस्थाओं की स्त्रियाँ पुरुष नही पचा पाते। विडम्बना ही है कि अधिकांश पुरुषों को ऐसी स्त्रियाँ मिल जाती हैं, लेकिन अधिकांश स्त्रियॉं को ऐसे पुरुष नही मिलते। इसके बावजूद दुनिया मे अबतक अमन चैन तो है ही। जिंदगी भी चल ही रही है। बसंत भी आ ही रहा है।
लेकिन सवाल है कि ऐसे मे अब मधूलिका क्या करे...! राघवेंद्र ने उसका मूल्य कभी नही समझा। उसकी आँखों तक मे झाँकने से डरते रहे। कहते कि तुम्हारी पुतलियाँ ललछौंहीं हैं। उनमे देखने से डर लगता है। बहुत मैटीरियलिस्टिक हैं राघवेंद्र। नौकरी, काम, तरक्की, औरत, बच्चे, सोसाइटी, रिश्ते सब समझते हैं, बस ज़िंदगी नही समझते। पहले ऐसे नही लगे थे, लेकिन एक बेटे के बाद से मुंह चुराने लगे। अब कोई आँखों मे ही न उतरे, तो मुहब्बत क्या खाक होगी...! अजीब अष्टाबक्र है जिंदगी। कहती तो माँ भी थी कि तू किसी की आँखों मे मत देखा कर। जादू है तेरी आँखों मे। लट्टू हो गया कोई तो आफत होगी। पर मुसकुराती हुई माँ की उस तस्वीर से पति की यह तस्वीर मेल नही खाती। पूरी तरह अलग है। उधर बेटी का सौन्दर्य निहारती माँ की वत्सल आँखों मे अपनी बेटी की नज़र उतारती, बलइया लेती भंगिमाएँ होती थीं। लेकिन यहाँ राघवेंद्र की आँखों मे अवहेलना है, कुछ न चाहने की गरज है, पेट भरे की उबकाई है। औरत सह तो लेती है लेकिन मर भी जाती है। मधूलिका भी मर गयी। जिंदगी से उसका उल्लास मर गया, भीतर का रोमांस मर गया। अंतर का प्यार मर गया। अपने अपने रास्ते एक ही ज़िंदगी मे दोनों खपने लगे।
दृश्य मे इधर कुछ परिवर्तन हुआ है। पत्थर पर कुछ दूब अंकुराई है। जिंदगी ढलान पर महसूस हुई है और एहसासों को पनाह मिलने लगी है। जिम्मेदारियाँ सिमटने लगी हैं। वक़्त बचने लगा है। जरूरतें पड़ने लगी हैं। जिंदगी थकने लगी है। मधूलिका मधूलिका मधूलिका...! अब क्या ....? मधूलिका तो मर गयी। वो तो मशीन हो गयी। भाव तो कपूर हो गए। एहसास तो श्मशान गए। आँखों पर तो अब चश्मा चाहिए। जादू तो अवतल लेंस की घाटी मे कहीं खो गया। आजकल राघवेंद्र मधूलिका को सीधी खड़ी करके उसकी आँखों मे आँखें डाल के जादू खोजते हैं। हाथों मे स्पंदन और ज़ुल्फों मे खम खोजते हैं। कहाँ से दे अब मधूलिका...? लेकिन असली सवाल ये नही है। असली सवाल ये है कि एक ज़िंदगी गलाकर भी अब भी उनको प्यार करना चाहती है मधूलिका पर ये हो नही पाता। दिल के तहख़ानों मे जहां कभी सात सात पहरे रहते थे, वहाँ अब सात सात ताले लटके हैं। 15 साल हो गए। क्या करे मधूलिका....? राघवेंद्र को माफ करना चाहती है। उनको प्यार करना चाहती है मधूलिका ....!
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