शादी के आज 23 साल हो गए। इतनी लंबी हो जाय तो हर कहानी के अपने स्याह सफ़ेद होते हैं पर खास बात ये कि वो भी बसंत था, ये भी बसंत है। यही 7 फरवरी थी। आज की दुनिया होती तो यही कहते कि हम रोज़ डे पर शादी कर रहे थे। लेकिन तब वो केवल शादी डे था। अब चूंकि बसंत था तो बसंत का मतवालापन आकर्षित तो करता ही है। बसंत का यह बांवरापन हमे इसलिए आकर्षित नही करता कि हम खुद नशे मे मतवाले हो जाते हैं। बसंत का मतवालापन इसलिए आकृष्ट करता है कि उसमे दूसरे की सुधि होती है, बस अपनी सुधि नही होती। कोई दूसरा नशा हो तो अपनी सुधि तो हरता ही है, दूसरों की सुधि भी हर लेता है, हमे सुधिविहीन बना देता है। लेकिन बसंत आता है, तो हमारी सुधि हमसे छीन लेता है, लेकिन कितनी ही सुधियाँ दूसरों की, जो हमसे छिन गयी हैं, अपने उन्माद से कहीं से वापस ला देता है। और हम फिर नए हो जाते हैं। अपने मे डूबने और धँसने से भी आदमी कहीं नया होता है भला....! आदमी नया होता है अपनी खोल से बाहर निकलकर खुलने से, दूसरों के लिए खिलने से, दूसरे का खिलना-खुलना निरखने से, निरखकर हुलसने से, थिरकने से,और दूसरे की अंसुआयी आँखें पीने से, पीकर अंसुआने से। बसंत आता है तो ताज़गी आती है। कुछ अपना जाना, अपना लुट जाना भी अच्छा लगता है। थोड़ा सा हमारा बचपन, थोड़ा सा हमारा कैशोर्य हमारी झोली मे कहीं से लाकर डाल जाता है बसंत। व्यष्टि को समष्टि बना देता है, अकेले मन को संगियों मे डाल देता है, भीड़ को अकेला कर देता है और अकेले मन मे सुधियों की, सुरभियों की, सुरों की और सिहरनों की भीड़ लगा देता है। सब उलट-पुलट कर रख देता है बसंत, फिर भी इसकी बाट जोही जाती है क्योंकि हम जानते हैं हम खुद तो उलट पुलट कर नही सकते...तो कोई और ही सही, जिसके पास साहस हो। कुछ बेहतर तो होगा, बस इसीलिए बार बार आदमी नए बसंत का खतरा मोल लेता है और ये खतरा मोल लेते ही रहना चाहिए। विद्यानिवास जी बसंत को 'मदन महीप का बालक' कहते थे। बिलकुल शरारती बच्चे का सा उत्पाती स्वभाव, पत्ते फहराओ, पत्रों का वाद्यवृंद बजाओ, इसे झुलाओ, उसे झुलाओ, इसे झुकाओ, उसे उठाओ,पिचकारी मे रंग भरो, यहाँ मारो, वहाँ मारो, दिशाएँ रंग दो, किसी को चिढ़ा दो, किसी को हंसा दो। वे कहते हैं कि उड़ीसा मे बसंत चोर की तरह आता है, चुपके से आता है, चुपके से ही चला भी जाता है, किसी को छू देता है, किसी को पुलकित कर देता है तो किसी को बिलकुल ही नही छूता। जयदेव के राधा-माधव का बसंती रास भी अधूरा ही रह जाता है। माधव आते हैं, राधा नही आतीं। राधा जब आती हैं और अपने बिना रास रचा देखती हैं तो रूठ जाती हैं, रूठने मनाने मे दिन रात निकल जाते हैं। हमारे हिन्दी क्षेत्र मे बसंत डाकू की तरह आता है, डौड़ी पिटवाकर आता है।, पेड़ों की नंगाझोरी कराता आता है। लेकिन है बिलकुल भोला डाकू, ढेर सारे रत्न पेड़ों पर न्योछावर करता, सुनहरी फसलों के सीस उतारता हहकारता हुआ चला जाता है। बसंती फसलों और गीतों का यह आमंत्रण भीतर कहीं दुबके पड़े मन के आत्मीय भाव को है। कम से कम इन दिनों मे कुढ़िए तो नही। मौसम खराब है, लड़के नालायक हैं, बहुयेँ मॉडर्न हैं तो क्या हुआ। ये लापरवाहियाँ हमारी सावधानियों से कुछ अधिक ही सुहानी हैं। इस सुहावनेपन का स्वागत तो कीजिये। देखिये तो सही कहाँ कहाँ उतर रहा है, किधर किधर समाँ बांध रहा है बसंत। आम मे, महुआ मे, अशोक मे, कचनार मे, कुरबक मे, बेला मे, चमेली मे, नीम मे, तमाल मे, नीबू मे, मुसम्मी मे, कमल मे, मालती मे, माधवी मे....ओह...! कितना सारा बसंत...! कितना प्यारा बसंत...!!
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