Saturday, 19 March 2016

दो छंद

धूप अँखुआ रही है, डोल पछुआं रही है,
शीत ऋतु जा रही है, आ रही है फागुनी। 
बाग बगबगा रहे हैं, खेत खिलखिला रहे हैं,
भौंर बौर से लिपट के गा रहे हैं रागिनी।
अस्त व्यस्त मन मस्त हो रहा है एक ओर,
दूजे आग तन सुलगा लगा रही है दोगुनी।
कैसे कहूँ प्राण! मन मेरा सकुचा रहा,
कुरेद रही आज 'वो' सुहानी रात जामुनी। ....... (1)
कुम्हिला रहा है फागुनी खुमार मे सिंगार,
यार मनुहार, इंतज़ार न कराइये।
मेरे ऋतुराज सरताज साज सुनिये,
है दिल की आवाज़ परवाज़ ले के आइये।
कजरे की कोर भरे आँख मे हिलोर,
पोर-पोर करे ज़ोर, अब और न सताइये।
आज न सुनूंगी, अंकशायिनी बनूँगी,
रुत फागुनी है प्राण! अब देर न लगाइये। ........ (2)

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