Saturday, 19 March 2016

श्रद्धांजलि नही, तिलांजलि दें...!


एक बार दादा धर्माधिकारी मुंबई से पटना जा रहे थे। वरिष्ठ स्वतन्त्रता सेनानी होने के अतिरिक्त दादा धर्माधिकारी तब महाराष्ट्र धारा सभा के सदस्य भी थे। ट्रेन मुगलसराय पहुंची तो उसी डिब्बे मे चढ़े तत्कालीन बिहार सरकार के स्वास्थ्य सचिव। बातचीत चली तो दादा ने पूछ लिया क्या हाल हैं बिहार मे कालाजार के। नयी सरकार के आने से हालात कुछ नियंत्रण मे आये...? स्वास्थ्य सचिव बोले--दादा, आपके आशीर्वाद से बहुत नियंत्रण हुआ है। बड़ी सफलता ही कहेंगे इस वर्ष बिहार मे कालाजार से सिर्फ ढाई परसेंट मौतें हुई हैं। बातचीत के बीच अचानक ध्यान गया बगल मे बैठी महिला सिसकियाँ लेकर रो रही थी। दादा एकदम से परेशान हुए। उन्होने महिला को ढांढस बँधाते हुए उनसे रोने की वजह पूछी। बुजुर्ग दादा के शालीन व्यक्तित्व से आश्वस्त होकर उस महिला ने घूँघट परे हटाते हुए कहा कि पिताजी इन लोगों की बातचीत हमेशा आंकड़ों मे होती है। बिहार मे इस वर्ष कालाजार से ढाई परसेंट मौतें ही भले हुई हों, लेकिन मेरा पति तो हंड्रेड परसेंट मर गया। और कहने की जरूरत नही कि ट्रेन मे उस डिब्बे का माहौल पूरी तरह भींग गया और स्वस्थ्य सचिव महोदय नज़रें चुराने लगे।
मुंबई से लेकर पठानकोट तक। कहानी तो वही है। बदला क्या है...? श्रद्धांजलि क्यो और किसे देनी है। सरकार से सहानुभूति रखी जाय या एयरबेस और सिविल पुलिस के लापरवाह अफसरों से...? व्यवस्था का वह पूरा हिस्सा जो इस वारदात के आसपास खेल रहा था, उसकी एक एक गतिविधि को परखिये। गृहमंत्री राजनाथ सिंह कहते हैं कि खुफिया रिपोर्ट्स पहले मिल जाने का फायदा ये हुआ कि नुकसान कम हुआ। वित्तमंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि मामूली नुकसान की कीमत पर बड़ी सफलता हासिल हुई है। यानी कुछ ही जवानों की कीमत पर हमने एयरबेस मे स्थापित तमाम जरूरी सामरिक एसेट्स और यंत्र, मशीनें आदि बहुमूल्य वस्तुएं बचा ली हैं। इसका अर्थ ये हुआ कि सात आठ जवानों के मरने का क्या वो तो देश मे बेरोजगारों की फौज पड़ी है, फिर मिल जाएँगे लेकिन ये एसेट्स नष्ट हो गए होते तो कहाँ कहाँ भीख मांगते फिरते। अलग बात है कि देश मे कोहराम है। समाज और परिवार असमय और अर्थहीन मौत मर गए अपने जवान बेटों की लाशों पर खून रो रहे हैं। ये मरने वाले सौ परसेंट मर गए तो क्या देश ने 'मामूली' नुकसान पर बड़ी सफलता तो पायी।
और वो सफलता क्या है...? सफलता ये कि जिस स्थान पर निगाह डालने की सोचने से भी पहले दुश्मन की रूह कांप जानी चाहिए, उस स्थान पर, अपने घर मे, अपने सर्व सुरक्षित एयरबेस मे हम उनसे तीन दिन तक लड़ते रहे, जहां हमे बताया जाता रहा है कि परिंदा भी पर नही मार सकता और उन पाँच छः को मारते मारते हम अपने छः सात गंवा बैठे ये सफलता है। तीन दिन पहले एसपी का अपहरण हुआ और उनकी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल किया गया। एसपी की सूचना पर उनके वरिष्ठों ने अतिखुफियागिरी का परिचय दिया और प्रथमदृष्ट्या दोषी या अपराधी उन्हे ही मान लिया। ये सफलता का पहला सूत्र था। उसके बाद चालीस किलोमीटर के रकबे मे फैले इस अतिसुरक्षित एयरबेस पर सावधानी और सुरक्षा का आलम देखिये कि दो आतंकवादी उसके पहले ही अंदर घुस चुके थे। बाकी के चार सरकारी गाड़ी मे अंदर घुसे और जिनपर हमे गर्व है, वे लोग इस पूरी हलचल से अनजान रहे, पूरी तरह बेखबर रहे। जवानों की कर्तव्यपरायणता का ये आलम तो गर्व करने से कुछ कम का अधिकारी ही नही। वे चौबीस घंटे छिपे रहे उस जोन मे जो हाई नही, हाईएस्ट एलर्ट वाला जोन है। जहां सेना है, जहां सामरिक महत्व के अतिसंवेदनशील एसेट्स और दस्तावेज़ हैं, जहां देश की इज्जत है, जहां देश की नाक है और कुल मिलाकर ये कि जहां देश की सारी उम्मीद है। तीन दिन तक दिल्ली से पठानकोट तक हज़ार सामरिक कौशल लगाकर भी अंततः कल वो बिल्डिंग ही उड़ानी पड़ गयी जिसमे वे पूरे आराम से कब्जा जमाये बैठे थे।
कैसा शर्मिंदगी का आलम है। अगर दुश्मन पाकिस्तान है, तो क्यो न हँसे वो हमपर...! वो तो आजमा चुके हैं हमे भी, हमारे हाई एलर्ट को भी और हमारे गर्व को भी। वे जानते हैं कि हिन्दुस्तानी हाई एलर्ट भी ऐसा होता है, जिसमे जब कोई घटना पठानकोट मे हो जाती है, तो बनारस के स्टेशनों पर कुत्ते दौड़ाए जाने लगते हैं साथ साथ पठानकोट मे सफलता और मिशन समाप्ति की घोषणा भी कर दी जाती है। हमारा हाई एलर्ट ऐसा होता है कि जो पुलिसवाले ड्यूटी पर अक्सर खैनी मलते पाये जाते हैं, वे सेना के जवानों के झोले भी चेक करने लगते हैं। हमारा हाई एलर्ट ऐसा होता है कि जब हमारे एयरबेस से जवानों के शव निकाल रहे होते हैं तब देश के छोटे छोटे कस्बों और शहरों मे पुलिस आम राहगीरों और शहरियों के ऊपर डंडे पटक रही होती है, उनकी गठरियाँ खोलकर सतुआ पिसान चेक कर रही होती है और लगभग उसी समय हाई एलर्टेड अचूक सुरक्षा व्यवस्था के बीच नोएडा जैसे 'विकसित' शहर मे एक पढ़ी लिखी लड़की को चार पाँच कुत्ते बलात्कार के लिए खींच रहे होते हैं।
अपनी जान गंवा चुके अपने जवानों को आइये अब श्रद्धांजलि देने का सिलसिला बंद करें। देनी ही है तो मरे हुओं को तिलांजलि देने की परंपरा रही है। जी हाँ तिल की अंजलि दें उन्हे जो कर्तव्यवीर तो कहलाते हैं पर कर्तव्य की बेदी पर देरी से पहुँचते हैं। निस्संदेह इस भारी लापरवाही और अकर्मण्यता के पीछे साधारण जवान नही, सेना और सिविल पुलिस के अफ़सरान खड़े हैं, वे बड़बोले राजनेता खड़े हैं, जिन्हे अपनी सेना पर आज सबसे ज्यादा गर्व हो रहा है क्योंकि मरने वाले उनकी ऐश के लिए अपनी ज़िंदगी लुटा बैठते हैं। हम अपने मृतकों को तिल की अंजलि देने वाले समाज के रहवासी हैं। मृतक का सम्मान मृतक की तरह ही होना चाहिए। ये शहादतें व्यवस्था द्वारा हम पर लादे गए बोझ की तरह हैं क्योंकि इन शहादतों की कोई जरूरत नही थी देश को क्योंकि कोई युद्ध नही लड़ रहा है देश। जरूरत तो इस बात की थी कि लफ़्टिनेंट कर्नल निरंजन और उनके शहीद साथी अपने परिवार मे रहे होते, अपनी नवब्याहता पत्नी और बेटी के सिर पर आज भी निरंजन का साया होता, काश वे लोग जीवित रहते और देश तथा सेना को लंबे समय तक उपलब्ध रहते...! हमारे शहीदों को देश की व्यवस्था ने मारा है, वे विक्टिम हैं...और आज का सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस देश मे ऐसे ऐसे भी.... विक्टिम हैं, उस देश मे आम आदमी को कौन पूछता है। उसका क्या हाल है...?

अमन और तालीम ही स्थायी समाधान हैं

एक समय ऐसा भी था जब पठानकोट का मास्टरमाइंड हमारी जेल मे बंद था। याद आ रहा है 1999 का वह प्लेन हाईजैक। मसूद अज़हर का भाई रऊफ असगर भाई को छुड़ाने की जुगतें लगा रहा था और हमारा प्लेन हमारी वायु सीमा मे घुसकर काबुल उड़ा ले गया। अटल जी की सरकार थी। प्लेन के सवारों के बदले छः आतंकियों को रिहा करने की शर्त थी। अंततः शर्त पूरी की गयी और तत्कालीन विदेश मन्त्री प्लेट मे सजाकर इन आतंकियों को काबुल ले गए। इस फैसले के पीछे वीपी सिंह के कार्यकाल मे हालिया मरहूम मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बिटिया के अपहर्ताओं की शर्तें मानकर खूंखार आतंकियों को रिहा करने की नजीर थी। इसे हम संप्रभु राष्ट्र कहते हैं, जिसकी दो दो सरकारों ने आतंकियों के सामने घुटने टेके। ये वही मसूद अज़हर है, जो तब काबुल मे छोड़ा गया था और तबसे लेकर आजतक पाकिस्तान मे छिपा बैठा है। जैश ए मुहम्मद का नेटवर्क उसके ही नेतृत्व मे सक्रिय है। पठानकोट हमले के पीछे इसी शातिर का हाथ था। ये हमारे हुक्मरानों की घुटना टेक नीति का परिणाम है। बात हुक्मरानों की करें तो आज ममता दीदी घेरे मे हैं। हिंसक भीड़ के सामने घुटने उन्होने भी टेके हैं। वोटों की फसल वहाँ भी कटने वाली है और तलवारें चमकाने पर कोई रोक नही है। मालदा की हैरतअंगेज़ हिंसा लज्जित करने वाली है। सरकारी अलमस्ती की पोल खोलने वाली है। लोकतन्त्र के मंदिर पर बदनुमा दाग लगाने वाली है। हिंसक समूह के बरक्स एक सरकारी चुप्पी हो तो कभी गुजरात होता है, कभी भागलपुर होता है, कभी सिख विरोधी दंगे होते हैं तो कभी मालदा होता है। समाज, समूह और सरकारों को पता होना चाहिए कि तलवारें चमकाने का वक़्त गया। अमन और तालीम ही स्थायी समाधान हैं इसके सिवा कुछ नही। जी हाँ, मै मानता हूँ कि इस ढाई लाखा मालदाई जलसे मे हिंसा थी, फिरकेवाराना नवैयत थी, होशविहीन जोश था, मजहब की ताबेदारी थी, अंधी सोच थी, नफरत थी और राजनीतिक किस्म का मजहबी तांडव था। वहाँ बस एक चीज़ जो नही थी, उसका नाम तालीम है। अगर तालीम होती तो उस हवाई समस्या का समाधान भी होता, जिसके कारण ये हिंसा हुई बताई जाती है। किसी एक कमलेश तिवारी को कहाँ कहाँ काटोगे भइया। वो कानून के फंदे मे तो है। अब क्या चाहिए आपको...? भीड़ कहकर जान बचाए देता हूँ वरना ढाई लाख लोगों का हुजूम भीड़ नही होता, जो भी होता है वो योजनाबद्ध होता है। योजनाएँ बनाइये देश के उत्थान के लिए, पतन के लिए नही। पैगंबर और रसूल सांप्रदायिक नफ़रतों से ऊपर होते हैं, बहुत ऊपर होते हैं।

हम अपने गौरवशाली इतिहास की फिराक मे नही, हम अपने लिए गौरवशाली भविष्य की फिराक मे हैं।

एक बार दो जर्मन नेशनल्स बनारस आए तो मुझसे मिलना हुआ। वे दोनों लविंग कपल थे लेकिन शादीशुदा नही थे। जल्दी ही शादी करने वाले थे और एकदूसरे के प्रति बला की हद तक आग्रही थे, समर्पित थे और वचनबद्ध भी थे। मेरी बेटी की स्लैम बुक मे dearest one के कालम मे दोनों ने ही एकदूसरे का नाम लिखा था-आन्या और फैबियन। दोनों ही समाजशास्त्र के शोधार्थी थे। मेरे घर वे दोनों हिन्दी सीखने आते थे। लगभग छः महीने का ये साथ था हमारा। उन्हे हिन्दी सिखाने के क्रम मे हम उनसे हिन्दी मे बातचीत खूब किया करते थे। राजनीतिक, सामाजिक विश्व की तमाम हलचलों पर उन दोनों से खूब चर्चा होती थी। अन्ना हज़ारे का आंदोलन रंग बिखेरे हुए था उन दिनों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशभक्ति की भावना देशभर मे हिलोरें ले रही थी। जाहिर है कि हम शुरुआत अखबारों मे छपे समाचारों पर चर्चा और संवाद से किया करते थे। इसी तरह की एक चर्चा मे एकदिन फैबियन ने मुझसे पूछ लिया कि ये अखबार मे जो देशभक्ति लिखा रहता है, उसका मतलब क्या है....? मैंने राष्ट्रीयता की भावना और अपनी मिट्टी के प्रति लगाव व निष्ठा के कई एक किस्से और दृष्टांत सुनाकर देशभक्ति का अर्थ उसके दिमाग मे उड़ेलने की कोशिश की, लेकिन उसको ये सब बताते हुए मुझे समझ मे ये आया कि देशभक्ति का अर्थ उसे अच्छे से पता है। वो कहना कुछ और चाहता था। उसने मुझसे जर्मन और अँग्रेजी मिश्रित हिन्दी मे जो पूछा, उसका अर्थ ये था कि अपनी धरती पर पैदा होने के कारण अपनी माँ की तरह उससे प्यार तो हम भी करते हैं, लेकिन हम ये नही समझ पाये कि आपलोग इतना देशभक्त क्यो होते हैं...? मै उसके इस सवाल से थोड़ा अचकचाया जरूर लेकिन समझाने की पूरी कोशिश की कि हम अपने अतीत पर गर्व कर सकते हैं इसलिए गर्व करते हैं। इस धरती ने अनेक वीर और महापुरुष पैदा किए हैं इसलिए हम इसका सम्मान करते हैं। हम अपने देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए जरूरत पड़ने पर जान देने के लिए तैयार रहते हैं। कारगिल युद्ध के दौरान हमारी सिविल सोसाइटी मे बहुतों ने गाँव और शहर का भेद मिटाकर सीमा पर जाने के लिए आवेदन दे डाले थे। हम अपनी मिट्टी को, अपनी प्रकृति को प्यार करते हैं। हम कृषि प्रधान देश हैं। हम धार्मिक देश हैं। हम राम और कृष्ण के वंशज हैं। हमारा इतिहास गौरवशाली इतिहास है। आदि आदि आदि आदि....हमने अपनी देशभक्ति के पीछे के हज़ार कारण उन दोनों को गिनवाए, लेकिन दोनों का माथा सिकुड़ा ही रहा। फिर मैंने पूछा-- तुमलोग हमारी तरह देशभक्ति फील क्यो नही करते...? मेरे इस सवाल का जवाब आन्या ने दिया। वो बोली--हम इसलिए देशभक्ति फील नही करते क्योंकि हमारा इतिहास गौरवशाली नही है और हमारे यहाँ वीर भी पैदा नही हुए और महापुरुष भी नही और भगवान भी नही। हम ध्यान से सुन रहे थे और उसका मानस परखने की कोशिश कर रहे थे। कि तबतक आन्या ने कुछ खास कह दिया। मुझे लगा शायाद मेरा समाधान ही हो गया। वो अचानक थोड़ी देर के लिए चुप होकर बोली-- किताबों मे गौरवशाली-गौरवशाली करके लिखा बहुत कुछ है, लेकिन हम कभी हिटलर को नही भूलते। हम गोयबल्स को नही भूलते। हम उन किताबों को नही पढ़ते, जिनमे झूठा इतिहास लिखा पड़ा है। जिनमे काल्पनिक बातें लिखी रखी हुई हैं। जिनमे जर्मनी को महान-महान लिखा हुआ है। हम उन किताबों की खोज मे रहते हैं, जिन्हे गोयबल्स ने जला डाला था।...वो अकेली बोल रही थी। मै, फैबियन और बाकी लोग सिर्फ सुन रहे थे। वो कह रही थी--हम लोग स्टूडेंट्स हैं। हम सोचते हैं कि हम खुद जर्मनी को महान बनाएँ। हम चाहते हैं कि हिटलर का नाम रबर से मिटा सकें तो मिटा दें। हम अपने गौरवशाली इतिहास की फिराक मे नही, हम अपने लिए गौरवशाली भविष्य की फिराक मे हैं।

जिंदगी चल रही है

डीजे की धाँय धाँय आवाज किसी बारात का संकेत कर रही है। सामने से ट्रैफिक भी ठिठक रहा है। प्रह्लादघाट से राजघाट की ओर इस ढलान पर .....वो कोई बारात हो या वारदात.... कभी ट्रैफिक जाम नही होता smile emoticon बारात नीचे घाट की ओर से आ रही है। .....कहाँ बितवला ना हो रतिया कहाँ बितवला ना...! मतिया मरलस कवन सवतिया रतिया कहाँ बितवला ना...!! चालू भोजपुरिया सिंगार की इस धुन पर छोकरे मतवाले हुए पड़े हैं। एक तरफ का ट्रैफिक अब पूरी तरह से जाम है। सिर पर लाइट्स के डिजाइनर सेट्स लादे हुए ये बच्चे बारात मे सबसे आगे हैं। 8, 10, 12, 14 साल तक के हैं ये लड़के लड़कियां। फटे पुराने कपड़े पहने नंगे पैर निर्विकार भाव से, सड़क जाम करके नाचती हुई बारात का नेतृत्व कर रहे हैं। इधर इस सनकी को देखो। खाली एक काली सी सरकती हुई हाफ पैंट पहने सात आठ साल का ये बाल मजूर एक हाथ से ऊपर लाइट संभाले है, दूसरा हाथ कमर पर रखे है, मुंह मे न जाने क्या चबाते हुए मटक रहा है और बस मटक रहा है। यह दृश्य देखकर डीजे की कर्कशता का असर थोड़ा कम होता है। ट्रैफिक अब रेंग रहा है। सीने की धड़कनों को पछाड़ता डीजे बगल से गुजरता है। दूल्हे के दोस्त नशे मे हैं। तालियाँ पीट-पीटकर हंस रहे हैं और कमरतोड़ नाच नाच रहे हैं। इधर एड़ी से चोटी तक लक़दक़ सजी हुई ये लड़कियां हैं तो सही बारात मे ही पर बेचारी नाच नही पा रही हैं इसलिए इधर ट्रैफिक मे कुछ खोजती हैं। ट्रैफिक से कोई ग्रीन लेजर लाइट चमका रहा है। आँख बचाती हुई लड़कियां हंस रही है और शर्मा रही हैं। इन रौनको के बाद सबसे पीछे हैं दूल्हे राजा विथ सहबाला। बेचारा, अपने हिस्से की घोड़ी पर सवार....! ट्रैफिक खुल रहा है। ढलान दिख रही है। जिंदगी चल रही है। ...........